Thursday, December 24, 2020

 हज़ार गुनाहों सा वो एक मंज़र था ,

 हबीब के हाथ में जो खंजर था.... 

दरिया अपनी रवानी खो महफूज़ था ,

रात अकेला जो रह गया समंदर था  ..... 

न जाने उससे मुलाक़ात हुई कि नहीं ,

कौन बाहर था कि कौन अंदर था ... 

माटी ने आखिर सबको बराबर तोला ,

कल ये कलंदर, कल वो सिकंदर था 

Wednesday, September 23, 2020

यूँ तो भीड़ में बाज़ारों के, दुकानों के हैं ,
हम अकेले में किताबों के ,मैखानों के हैं 

ये खुशबु, ये तारे, ये बारिश, ये जुगनू ,
सब किरदार ये अपने फ़सानों के हैं 

गुज़र जाते हो तुम जिनसे किनारा करके,
खून के ये धब्बे किसानों के हैं 

खामोश रातों में जो सोने नहीं देते ,
अज़ल से शोर दिल के वीरानों के हैं 

Sunday, September 20, 2020

क्या कहिए

 किसी से यहाँ अब और क्या कहिए 

न कहिए कुछ तो बस भला कहिए ..... 

जो अब्र -ए -ग़म बरस जाए आँखों से,

सिवा उसके और किसको दवा कहिए  .... 

गुज़र चुके सब्र के सब इम्तेहान हम पर ,

अब बेवफ़ा कहिए कि बावफ़ा कहिए  .... 

इस आग की ज़द में कितने घर आए ,

किस किस पे गुज़रा ये सानेहा कहिए  .... 

बचपन के वो शजर आते हैं ख्वाब में,

क्या हुए हम कि और किसको सज़ा कहिए  .... 

कब दूर था यूँ तो मक़ाम-ए -अर्श हमसे ,

वो ज़ब्त था कि बस शुक्र-ए-खुदा कहिए .....  






Thursday, July 16, 2020

यही गुफ़्तगू रहती है कभी धूप से कभी छाँव से,
दूर बहुत आ गए हैं हम अपने गाँव से ,

तेरी यादों के साथ भी ये सफर कटता नहीं
न थकन ही जाती है न छाले पाँव से 

Sunday, July 5, 2020

बीच अपने इतना भी तो फासला नहीं ,
कैसे कह दें कि अब कोई गिला नहीं

पानियों पे लिखी है जिसने तक़दीर सबकी,
उसे कह दो कि पढ़ने का अब हौसला नहीं

क्या क्या न गुज़री एक दिल को नेक रखने में ,
हम वो भी खो आए जो कभी मिला नहीं

वो ईसा की सलीब हो कि सुकरात का प्याला,
तारीख़ किरदार बदलती है मगर फैसला नहीं



Sunday, May 17, 2020

न वो हिज्र लिखता न मैं विसाल लिखता,
न शहर-ए-दिल में कोई ये बवाल लिखता

उसे शिकायत है मुझसे तग़ाफ़ुल की,
लिखता भी मैं तो रंज-ओ-मलाल लिखता

जाने है वो मैं सच कहने से मुकर जाऊंगा ,
वरना क्यों न खत में पुर्सिश-ए-हाल लिखता

आता जो कभी नेमतों का ज़िक्र तो मैं ,
एक पुराना संदूक, एक पुरानी शाल लिखता




Thursday, May 14, 2020

पर

ठहर जाती है दास्तान एक इसी सवाल पर,
कभी तेरे उरूज पर, कभी मेरे ज़वाल पर

ख़याल-ए-यार से घबरा रहा हूँ मैं,
सौ पहरे लगे हैं एक हसरत-ए-विसाल पर

परत दर परत खुली असीरी मुझ पर जहान की,
कोई डरा है मुस्तक़बिल से, कोई रो रहा है हाल पर

हर साँस कोई सानेहा सा साथ है ,
कई तीर खिंच गए हैं एक सहमे ग़ज़ाल पर


****************************

उरूज = ascension, rising
ज़वाल = decline
हसरत-ए-विसाल = desire to meet
असीरी = imprisonment
 मुस्तक़बिल =future
सानेहा = an accident, disaster,
ग़ज़ाल = young deer

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...