Thursday, December 24, 2020

 हज़ार गुनाहों सा वो एक मंज़र था ,

 हबीब के हाथ में जो खंजर था.... 

दरिया अपनी रवानी खो महफूज़ था ,

रात अकेला जो रह गया समंदर था  ..... 

न जाने उससे मुलाक़ात हुई कि नहीं ,

कौन बाहर था कि कौन अंदर था ... 

माटी ने आखिर सबको बराबर तोला ,

कल ये कलंदर, कल वो सिकंदर था 

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