हज़ार गुनाहों सा वो एक मंज़र था ,
हबीब के हाथ में जो खंजर था....
दरिया अपनी रवानी खो महफूज़ था ,
रात अकेला जो रह गया समंदर था .....
न जाने उससे मुलाक़ात हुई कि नहीं ,
कौन बाहर था कि कौन अंदर था ...
माटी ने आखिर सबको बराबर तोला ,
कल ये कलंदर, कल वो सिकंदर था
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