Wednesday, February 29, 2012

कुछ दूरी सी


थे  वो पास  और  कुछ  दूरी  सी ,
चाँद  पूरा  और  रात  अधूरी  सी ....

खेल  रही  थी  शाम  पलकों  पर  ,
रात  की  चादर  हलकी  सी  कुछ  गहरी  सी ...

खामोश  नज़र  से कैसे  कैसे  अफ़साने ,
बात  रह  गयी  पर  होते  होते  पूरी  सी ...

नफस  नफस  बस  एक  सा  आलम  ,
जाते  जाते  रह  जाये  कोई  हसरत  ठहरी  सी ....

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...