Monday, January 26, 2015

एहद पर अपने वो कायम ऐसे हैं
ज़ख्म ये दिल को कि मरहम जैसे हैं

रत्ती रत्ती सुकूँ हमने यहाँ भी पाया ,
बादा -ओ -सागर  भी अब तो दैर -ओ -हरम जैसे हैं

एक कौर को रोटी , एक दस्त -ए -दुआ ,
अल्लाह जाने ये ग़म कैसे हैं

दामन दामन लहू लहू , हाथ हाथ को खंजर ,
 कुछ हम उन जैसे, कुछ वो हम जैसे हैं


दस्त -ए -दुआ =hand raised in prayer
बादा -ओ -सागर  = wine and goblet

Tuesday, January 13, 2015

यूँ  अब अहल -ए -जहाँ  से मिला करते हैं ,
खुद से  तो कभी ज़िन्दगी से गिला करते हैं

सुबह की धूप , शब की चांदनी सी,
हर दुआ हो जाये ये दुआ करते हैं

ये शरीफों की बस्ती है यहाँ कौन पूछे
मुफ़लिसी के जंगल यूँ ही जला करते हैं

ये घर की दीवारें, ये कमरे का आइना
कुछ मुझसे कहा करते हैं, कुछ मुझसे सुना करते हैं

है यादों का एक दरख़्त  दिल के आँगन में
जब भी हवा  चलती है , कुछ फूल गिरा करते हैं







 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...