Saturday, January 16, 2021

धूप और ओस

 तुम और मैं अलग थे ,

हमारा सफर,  हमारी  मज़िलें 

सब अलग अलग  थीं 

मगर बीच में रात हुई ,

रात ने हम दोनों  को रोक दिया 

वो अंधेरा, वो ख़ामोशी 

मेरी थी, तुम्हारी थी 

अब  हमारे बीच फ़र्क कम था 

वो दूरी घट गई थी 

अँधेरे ने हमें बराबर कर दिया 

लगा कि हर उलझी गाँठ 

खुल गई और एक दूसरे को 

हम बेहतर देख पाए, समझ  पाए 

मगर तभी सुबह हो गयी 

और सुबह के साथ 

तुम धूप हो गए 

मैं ओस हो गया 

और बात रह गई 


 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...