इश्क़ के सब रास्ते बड़े दुश्वार निकले ,
अहल-ए -शहर जितने थे सब तेरे बीमार निकले
अब कहाँ पहले सी होने की वो जद्दोजहद ,
हम जब भी घर से निकले तो तैयार निकले
ये अजब फैसला हुआ हमारे हक़ में ,
ख़्वाब ही अपनी नींदों के गुनहगार निकले
ये फूल ये तारे ये बारिश ये जुगनू ,
जितने हैं सब तेरे किरदार निकले