Saturday, April 24, 2021

 इश्क़ के सब रास्ते बड़े दुश्वार निकले ,

अहल-ए -शहर जितने थे सब तेरे बीमार निकले 

अब कहाँ पहले सी होने की वो जद्दोजहद ,

हम जब भी घर से निकले तो तैयार निकले 

ये अजब फैसला हुआ हमारे हक़ में ,

ख़्वाब ही अपनी नींदों के गुनहगार निकले 

ये फूल ये तारे ये बारिश ये जुगनू ,

जितने हैं सब तेरे किरदार निकले 

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...