Saturday, February 27, 2010

मैं और तुम

कितना और रोयें , कि इक बार मुस्कुरा सकें ,
और कितना खोएं , कि इक बार पा सकें

लम्बा हो सफ़र , तो ये इनायत ही कर खुदा ,
जो दूर हो चले हैं , कभी पास आ सकें

इस दयार में उलझी हैं राह सब ,
साथ चल कि हमसफ़र , कुछ दूर जा सकें

उम्र ने बुनी खामोशियाँ ये क्यूँ ,
कभी तू ही पूछ बैठे , कि हम बता सकें

Wednesday, February 24, 2010

poem

शौक़ को हैं मंजिलें हासिल और भी कई ,
एक तू ही नहीं साथ गर तो गम क्या है

तेरे शहर में जो कभी आये है ज़िक्र अपना ,
मेरे हिस्से ये इनायत ही कम क्या है

अश्क रोती हैं आँखें कि लहू रिसता है ,
कुछ यूँ हमने जाना एहल-ए-सितम क्या है

वो संग -ऐ -मज़ार होता है गवाह मेरा ,
वो बताये तो बताये कि चश्म -ऐ -नम क्या है

Wednesday, February 17, 2010

मधुशाला

भग्न हृदय कि करुणा से ,
आज रचा मैंने प्याला ...

अमर क्षुधा इन प्राणों की ,
माँग रही कैसी हाला ...

भूल चूका था मैं तो लेकिन ,
याद रहा फिर भी उसको ...

बुला रहा है प्रियतम साकी ,
खुली है फिर से मधुशाला ....

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...