Wednesday, February 24, 2010

poem

शौक़ को हैं मंजिलें हासिल और भी कई ,
एक तू ही नहीं साथ गर तो गम क्या है

तेरे शहर में जो कभी आये है ज़िक्र अपना ,
मेरे हिस्से ये इनायत ही कम क्या है

अश्क रोती हैं आँखें कि लहू रिसता है ,
कुछ यूँ हमने जाना एहल-ए-सितम क्या है

वो संग -ऐ -मज़ार होता है गवाह मेरा ,
वो बताये तो बताये कि चश्म -ऐ -नम क्या है

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