वो मेरा कब था की हुआ गैर समझूँ मैं ,
बख्श अब मर्ग ख़ुदा कि खैर समझूँ मैं
गाँठ गाँठ कर खोली है बात दिल ने ,
हाल -ऐ -दिल अब यूँ तेरे बगैर समझूँ मैं
बातें ये दीन की , मुझसे कर ना और वाइज़ ,
क्या हरम कि और अब , क्या दैर समझूँ मैं