Tuesday, April 26, 2011

poem

वो मेरा कब था की हुआ गैर समझूँ मैं ,
बख्श अब मर्ग ख़ुदा कि खैर समझूँ मैं


गाँठ गाँठ कर खोली है बात दिल ने ,
हाल -ऐ -दिल अब यूँ तेरे बगैर समझूँ मैं


बातें ये दीन की , मुझसे कर ना और वाइज़ ,
क्या हरम कि और अब , क्या दैर समझूँ मैं

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...