Wednesday, October 5, 2011

गुज़री है


क्या  कहूँ  कैसे ये उम्र-ए-सोगवार  गुज़री  है ,
ज़ख्म -ए -जिगर  से  नश्तर  सी  बार  बार  गुज़री  है 

गुज़रे  हैं  सेहरा-ए- दिल  से  कितनी  हसरतों  के  काफ़िले ,
जागती  आँखों  में  कैसे  शब् -ऐ -इंतज़ार  गुज़री  है 

दिल  ही  था  जो  न  माना  कि  हम  दूर  हो  चले ,
वो  आये  तो  ख़बर  गलियों  से  कई  बार  गुज़री  है 

अब  इस  ख़याल  से  तस्कीन  है  दिल -ऐ -नाकाम  को ,
हम पर  जो  बीती , कुछ  उन  पर  भी  यार  गुज़री  है 


1 )  सोगवार = sorrowful / grieved
2)  तस्कीन  = comfort, consolation

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...