Sunday, December 1, 2013

poem

तू रहे , मैं रहूँ और ये जहाँ रहे ,
आँखों में नमी कुछ पैरों में थकान रहे

यूँ तो मसलहत से रहे मजबूर दोनों ,
पर क्या है ये जो अपने दरमयां रहे

और कुछ छीन भी ले ये दुनिया लेकिन  ,
तितली को फूल यहाँ परिंदों को आसमान रहे

मिट्टी के इन घरों में हया सिमटी है ,
दुआ करो खुदा इनका निगेहबान रहे

आये मुक़ाबिल जो तक़दीर तो उस दम ,
कि सुबह  में रात का कुछ निशाँ रहे



 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...