Tuesday, February 24, 2015

बिस्कुट

बहुत दिनों पहले मैं एक शाम को बाज़ार से लौटते समय बस स्टॉप पर लौटने की बस का इंतज़ार कर रहा था। मेरे पास कुछ दो तीन  कुत्ते इधर उधर बैठे थे। कभी चाय की दूकान की ओर ताकते , कभी वहां खड़े लोगों की और , कि शायद कोई तरस खा कर कुछ उनकी ओर फ़ेंक दे। कोई बिस्कुट का टुकड़ा , कोई बासी पावरोटी  उनकी ओर उछले।
मेरी बस आने में देर थी तो मैंने एक पैकेट खरीद कर उसमे से चार चार बिस्कुट दो कुत्तों में बाँट दिए और अपने बाकी साथियों के साथ वापिस आकर बैठ गया। थोड़ी देर में मैंने देखा की एक ने तीन बिस्कुट खाकर , आखिरी बिस्कुट  मुंह में दबा लिया था। वो उस बिस्कुट को मुंह में दबाये हुए ही वहीं एक छोटा का गड्ढा खोदने लगा और फिर बिस्कुट को गड्ढे में गिराकर वो दुबारा उसे धुल और मिट्टी से ढकने लगा।
मैं ये सब बहुत देर से देख रहा था कि अचानक मुझे ये ख्याल आया कि हमारी ज़िन्दगी भी शायद कुछ कुछ ऐसी ही है।
हम सब भी अपने हिस्से की ख़ुशी या खुशफहमी की हिफाज़त करने की ऐसी ही ज़िद करते हैं जैसी वो कुत्ता कर रहा था। धूल और मिटटी में सने होने के बावजूद उसके लिए वो बिस्कुट मेहफ़ूज़ था , उसके हिस्से का था।
मैं नहीं कह सकता की हम हार रहे हैं या जीत रहे हैं। मगर इतना ज़रूर है की हमने गड्ढे खोदना बंद नहीं किया है। बड़े बड़े गड्ढे खोद डाले हैं हमने छोटे छोटे बिस्कुटों के लिए- सब मसरूफ हैं, थक चुके हैं , मगर खोद रहे हैं ।

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...