Sunday, May 17, 2020

न वो हिज्र लिखता न मैं विसाल लिखता,
न शहर-ए-दिल में कोई ये बवाल लिखता

उसे शिकायत है मुझसे तग़ाफ़ुल की,
लिखता भी मैं तो रंज-ओ-मलाल लिखता

जाने है वो मैं सच कहने से मुकर जाऊंगा ,
वरना क्यों न खत में पुर्सिश-ए-हाल लिखता

आता जो कभी नेमतों का ज़िक्र तो मैं ,
एक पुराना संदूक, एक पुरानी शाल लिखता




Thursday, May 14, 2020

पर

ठहर जाती है दास्तान एक इसी सवाल पर,
कभी तेरे उरूज पर, कभी मेरे ज़वाल पर

ख़याल-ए-यार से घबरा रहा हूँ मैं,
सौ पहरे लगे हैं एक हसरत-ए-विसाल पर

परत दर परत खुली असीरी मुझ पर जहान की,
कोई डरा है मुस्तक़बिल से, कोई रो रहा है हाल पर

हर साँस कोई सानेहा सा साथ है ,
कई तीर खिंच गए हैं एक सहमे ग़ज़ाल पर


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उरूज = ascension, rising
ज़वाल = decline
हसरत-ए-विसाल = desire to meet
असीरी = imprisonment
 मुस्तक़बिल =future
सानेहा = an accident, disaster,
ग़ज़ाल = young deer

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...