न वो हिज्र लिखता न मैं विसाल लिखता,
न शहर-ए-दिल में कोई ये बवाल लिखता
उसे शिकायत है मुझसे तग़ाफ़ुल की,
लिखता भी मैं तो रंज-ओ-मलाल लिखता
जाने है वो मैं सच कहने से मुकर जाऊंगा ,
वरना क्यों न खत में पुर्सिश-ए-हाल लिखता
आता जो कभी नेमतों का ज़िक्र तो मैं ,
एक पुराना संदूक, एक पुरानी शाल लिखता
न शहर-ए-दिल में कोई ये बवाल लिखता
उसे शिकायत है मुझसे तग़ाफ़ुल की,
लिखता भी मैं तो रंज-ओ-मलाल लिखता
जाने है वो मैं सच कहने से मुकर जाऊंगा ,
वरना क्यों न खत में पुर्सिश-ए-हाल लिखता
आता जो कभी नेमतों का ज़िक्र तो मैं ,
एक पुराना संदूक, एक पुरानी शाल लिखता
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