Sunday, July 5, 2020

बीच अपने इतना भी तो फासला नहीं ,
कैसे कह दें कि अब कोई गिला नहीं

पानियों पे लिखी है जिसने तक़दीर सबकी,
उसे कह दो कि पढ़ने का अब हौसला नहीं

क्या क्या न गुज़री एक दिल को नेक रखने में ,
हम वो भी खो आए जो कभी मिला नहीं

वो ईसा की सलीब हो कि सुकरात का प्याला,
तारीख़ किरदार बदलती है मगर फैसला नहीं



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