वो हुआ आज यूँ है मेहरबान सुनते हैं,
बारहा मेरे ज़िक्र पर हुआ हैरान सुनते हैं
बदन के सौदे ये मोहब्बत के खेल सारे ,
लैला-ओ -मजनू बहुत हैं परेशान सुनते हैं
ये किसकी आहट सन्नाटे को तोड़े है,
फरिश्ते रुक रुक के जिसकी जुबां सुनते हैं
आज ठहरा है मुक़द्दर में इम्तेहान अपना ,
है इंतज़ार में कोई संग-ए-आस्तां सुनते हैं
कुछ तो तौफीक़ अता हो तुझे ऐ सब्र ,
कि अभी दूर बहुत है उसका मकाँ सुनते हैं
बारहा मेरे ज़िक्र पर हुआ हैरान सुनते हैं
बदन के सौदे ये मोहब्बत के खेल सारे ,
लैला-ओ -मजनू बहुत हैं परेशान सुनते हैं
ये किसकी आहट सन्नाटे को तोड़े है,
फरिश्ते रुक रुक के जिसकी जुबां सुनते हैं
आज ठहरा है मुक़द्दर में इम्तेहान अपना ,
है इंतज़ार में कोई संग-ए-आस्तां सुनते हैं
कुछ तो तौफीक़ अता हो तुझे ऐ सब्र ,
कि अभी दूर बहुत है उसका मकाँ सुनते हैं