Thursday, March 20, 2014

सुनते हैं

वो हुआ आज यूँ है मेहरबान सुनते हैं,
बारहा मेरे ज़िक्र पर हुआ हैरान सुनते हैं

बदन के सौदे ये मोहब्बत के खेल सारे ,
लैला-ओ -मजनू  बहुत हैं परेशान सुनते हैं

ये किसकी आहट सन्नाटे को तोड़े है,
फरिश्ते रुक रुक के जिसकी जुबां सुनते हैं

आज ठहरा है मुक़द्दर में  इम्तेहान अपना ,
 है इंतज़ार में कोई संग-ए-आस्तां सुनते हैं

कुछ तो तौफीक़ अता हो तुझे ऐ सब्र  ,
कि अभी दूर बहुत है उसका मकाँ सुनते हैं








 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...