Sunday, November 27, 2011

कभी कभी

ये तो नहीं कि दिल दुखता नहीं अब मगर कभी कभी,
खामोशियों में घुल सी जाती हैं शब्-ओ-सहर कभी कभी

इस इक यकीन पे कायम हैं मेरे सजदे अब तक,
दुआओं में भी होता है असर कभी कभी

पानी पे लकीरों सी मुक़द्दर तेरे मेरे प्यार की,
दिल को दिल की होती है खबर कभी कभी

खुशियों को पता दूँ कि आ भी जाएँ ,
याद आये जो उन्हें मेरा घर कभी कभी  

Thursday, November 24, 2011

यूँ सही


नहीं  कुछ  और  मैं  तेरी  राहों  में  एक  मंज़र  सही , 
पास  आ  कि  मैं  सेहरा  सही  तू  समंदर  सही 
आकर   ठहरें  तेरी  यादों  के  काफिले  कभी, 
दिल  अपना  एक  वीरान  शहर  सही 
मैं  वो  रिंद  नहीं  कि  शराबों   को  तोलूं ,
गम  – ए -यार  नहीं  मुझको  गम -ए-दहर  सही 


1) रिंद = drunkard, free thinker
2) दहर = world
3) वक़्त -ए -अजल = time of end, death

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...