Thursday, November 24, 2011

यूँ सही


नहीं  कुछ  और  मैं  तेरी  राहों  में  एक  मंज़र  सही , 
पास  आ  कि  मैं  सेहरा  सही  तू  समंदर  सही 
आकर   ठहरें  तेरी  यादों  के  काफिले  कभी, 
दिल  अपना  एक  वीरान  शहर  सही 
मैं  वो  रिंद  नहीं  कि  शराबों   को  तोलूं ,
गम  – ए -यार  नहीं  मुझको  गम -ए-दहर  सही 


1) रिंद = drunkard, free thinker
2) दहर = world
3) वक़्त -ए -अजल = time of end, death

2 comments:

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...