Monday, November 25, 2019

लगता है ज़िन्दगी में उसने खोया बहुत है ,
मेरे सीने  से लिपट के वो रोया बहुत है

किस तरह वो समझेगा मेरी बात अब,
लिखते हुए ये खत मैंने भिगोया बहुत है

एहसास भर से जो चमक उठती हैं आँखें ,
तक़दीर को अपनी इतना ही गोया बहुत है

किसी जतन से भी जाता ही नहीं ,
ये दाग-ए -दामन कि मैंने धोया बहुत है

कौन बचा है यहाँ सफर के हादसों से,
कोई फुरक़तों का जागा, कोई वस्ल में सोया बहुत है




Friday, November 1, 2019

new poem

हमने माना कि वो बहुत दाना है,
दिल-ए -मजबूर का मगर अपना ही फ़साना है .... 

बदल लेगा वो शहर भर के रास्ते लेकिन ,
अपने घर उसने इसी गली से जाना है ....

हर गाम पर रोके हैं ये चाँद ये तारे ये जुगनू ,
दिन के मुसाफिर ने मगर सहर तक जाना है ....

इश्क़ की हमसे अब और न कहिये ज़ाहिद,
बीमार बदल जाते हैं, पर मर्ज़ पुराना है ....



दाना = wise
गाम  = step

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...