Wednesday, July 31, 2013

जज़्बात

गवाह करूँ तुझको और मैं अपनी ज़ात लिखूं ,
यूँ ही अपने दिन लिखूं  मैं, यूँ ही अपनी रात लिखूं 

घास की चादर पर रात के आंसू बिखरे  हैं,
मैं कि हँसता चाँद लिखूं  या तारों की सौगात लिखूं 

किसी पुराने कागज़ पर, याद मिली कुछ मैली सी  
आते आते रह गयी जो होंठों तक वो बात लिखूं 

खामोश दरख्तों पर शाम ने आँचल डाला यूँ  ,
ज़र्रा ज़र्रा बिखर गए , ऐसे वो जज़्बात लिखूं


ज़ात = person/self/personality
दरख्तों = trees









Thursday, July 18, 2013

उलझन

कौन कहता है  उजड़े दिलों में चाहत नहीं होती
ये और है कि बुतों की हमसे इबादत नहीं होती

बहुत लम्बा है खामोशियों का सफ़र अपना  ,
सच कहने की मगर अब  हिम्मत नहीं होती

उलझे रास्तों का धीमा सफ़र है
ज़िन्दगी शायद और खूबसूरत नहीं होती

चाँद सितारों की, जुल्फों की बात करते ,
ज़िन्दगी मगर तुझसे फुर्सत नहीं होती














 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...