गवाह करूँ तुझको और मैं अपनी ज़ात लिखूं ,
यूँ ही अपने दिन लिखूं मैं, यूँ ही अपनी रात लिखूं
घास की चादर पर रात के आंसू बिखरे हैं,
मैं कि हँसता चाँद लिखूं या तारों की सौगात लिखूं
किसी पुराने कागज़ पर, याद मिली कुछ मैली सी
आते आते रह गयी जो होंठों तक वो बात लिखूं
खामोश दरख्तों पर शाम ने आँचल डाला यूँ ,
ज़र्रा ज़र्रा बिखर गए , ऐसे वो जज़्बात लिखूं
ज़ात = person/self/personality
दरख्तों = trees
ज़ात = person/self/personality
दरख्तों = trees
simply brilliant :)
ReplyDeletethanks :)
ReplyDeleteVery nice
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