Thursday, July 16, 2020

यही गुफ़्तगू रहती है कभी धूप से कभी छाँव से,
दूर बहुत आ गए हैं हम अपने गाँव से ,

तेरी यादों के साथ भी ये सफर कटता नहीं
न थकन ही जाती है न छाले पाँव से 

Sunday, July 5, 2020

बीच अपने इतना भी तो फासला नहीं ,
कैसे कह दें कि अब कोई गिला नहीं

पानियों पे लिखी है जिसने तक़दीर सबकी,
उसे कह दो कि पढ़ने का अब हौसला नहीं

क्या क्या न गुज़री एक दिल को नेक रखने में ,
हम वो भी खो आए जो कभी मिला नहीं

वो ईसा की सलीब हो कि सुकरात का प्याला,
तारीख़ किरदार बदलती है मगर फैसला नहीं



 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...