Monday, November 25, 2019

लगता है ज़िन्दगी में उसने खोया बहुत है ,
मेरे सीने  से लिपट के वो रोया बहुत है

किस तरह वो समझेगा मेरी बात अब,
लिखते हुए ये खत मैंने भिगोया बहुत है

एहसास भर से जो चमक उठती हैं आँखें ,
तक़दीर को अपनी इतना ही गोया बहुत है

किसी जतन से भी जाता ही नहीं ,
ये दाग-ए -दामन कि मैंने धोया बहुत है

कौन बचा है यहाँ सफर के हादसों से,
कोई फुरक़तों का जागा, कोई वस्ल में सोया बहुत है




Friday, November 1, 2019

new poem

हमने माना कि वो बहुत दाना है,
दिल-ए -मजबूर का मगर अपना ही फ़साना है .... 

बदल लेगा वो शहर भर के रास्ते लेकिन ,
अपने घर उसने इसी गली से जाना है ....

हर गाम पर रोके हैं ये चाँद ये तारे ये जुगनू ,
दिन के मुसाफिर ने मगर सहर तक जाना है ....

इश्क़ की हमसे अब और न कहिये ज़ाहिद,
बीमार बदल जाते हैं, पर मर्ज़ पुराना है ....



दाना = wise
गाम  = step

Monday, September 2, 2019

मनुष्य होने की मनुष्यता

जो कहने जा रहा हूँ उसमें कुछ नया नहीं है। लेकिन मन को कोई बात यदि कचोटने लगे तो शायद कह देना अच्छा है। आजकल खबरों से बहुत डर लगने लगा है। अख़बार पढ़ना बहुत पहले छोड़ चुका हूँ। छितराये और हल्के-फुल्के मनोरंजन के लिए facebook और youtube का साथ है मगर वहाँ भी खबरें भूत की तरह पीछे लग गयी हैं। पर्यावरण की तबाही की खबरें, बलात्कार, हत्या जैसे कुकर्मों का विस्तार वर्णन, निकृष्ट स्तर की राजनीति जैसे तमाम सन्दर्भ आदि आदि।
एक समय था जब लोग एक दूसरे की निजी ज़िन्दगी में दिलचस्पी बनाये रखने के लिए social media से जुड़े रहते थे। 8 -9  साल पहले तक facebook / orkut  (जो पुराने चावल हैं उनके लिए ) का मतलब था किसकी शादी किससे, किसकी नौकरी कहाँ , कौन कहाँ घूम रहा है वगैरह वगैरह। ये खालिस मनोरंजन था। देवरों को नयी भाभियाँ दिखतीं, रोमियो की जूलियट से बात होती। मगर अब वहाँ सिर्फ राजनीति है. सब लोग मदारी के खेल में जुटी भीड़ की तरह तमाशबीन हैं, मगर सब को लगता है उनका किरदार मुकम्मल है। मगर सोचने की बात ये है कि मदारी के खेल में सिर्फ बन्दर बन्दर नहीं होता। वो भीड़ को भी बन्दर की तरह बेवक़ूफ़ बनाता है। बन्दर के गले की रस्सी सबको दिखती है मगर रस्सी सबके गले में है। सब उछल रहे हैं और खेल बराबर जारी है.
खैर बात ख़बरों की हो रही थी। इन सब बुरी ख़बरों में एक बात जो मुझे बहुत साफ़ दिखती है  वो ये है कि ये तमाम सन्दर्भ इस बात की ओर सीधा इशारा करते हैं की बीतते समय के साथ हम कहँ न कहीं अपने मनुष्य होने से जुड़ी कोमलता की सामूहिक हत्या कर चुके हैं। अपनी बौद्धिक यात्रा में मनुष्य ने सिर्फ तरक्की ही नहीं कमाई , बहुत बड़ा पतन भी कमाया। और यही पतन हमारी विरासत, हमारी थाती है. हम बाकी जीवों से चतुर थे या सच कहिए तो मक्कार थे, इसलिए प्रकृति पर अपना वर्चस्व कायम कर पाए। हमारे वर्चस्व ने हमें संसाधनों पर सत्ता दी, मगर हमारे लालच, हमारे अंदर की हिंसा से हम हार गए। पहुँचते पहुँचते हम आज वहां खड़े हैं जहाँ से हमें बहुत आगे नहीं दिख रहा। आज ज़मीन, हवा, पानी सबमें हम ज़हर घोल चुके हैं। और ये ज़हर हमारी आने वाली  पीढ़ियों की नसों में,उनकी साँसों में जायेगा। सोच कर देखिए तो अजीब लगेगा-आदमी अकेला ऐसा जीव है जो हत्या को व्यवसाय में बदल सका। हमने death को भी एक commercial enterprise में बदल दिया। पहले हम भूखे थे इसलिए शिकार करते थे. जानवर आज भी भूख के मारे शिकार करता है। वो उसी नियम से आज तक बंधा है मगर हम अब व्यवस्थित हत्या का कारोबार बना चुके हैं। और यदि कोई सवाल पूछे तो ईमानदार जवाब सिर्फ ये होना चाहिए की हम ऐसा करते हैं क्यूंकि हम ऐसा कर सकते हैं. बुद्धिजीवी ऐसे सवाल में एक संकीर्ण मानसिकता देखते हैं। वो मानते हैं की इस तरह का सवाल "freedom of choice" के खिलाफ है। मगर मज़ेदार बात ये है की यहाँ "freedom" और "choice" ये दोनों शब्द हमने बड़ी चतुराई से सिर्फ अपनी बपौती मान लिए । आप जंगल में किसी भूखे शेर के सामने निशस्त्र खड़े होकर एक अंतिम बार इसी freedom of choice को बहुत अलग ढंग से समझ पाएंगे।
ये बात तो हुई हमारे और प्रकृति के रिश्तों की। मगर हमारे आपसी संबंधों की कोमलता , सहिष्णुता भी धीरे धीरे पथरा रही है। हम पढ़ लिख कर तार्किक बन गए, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना लिया लेकिन जो बात हमें हमारी ज़मीनी सच्चाई  से जोड़ती है, एक दूसरे के दर्द और तकलीफ से सांझा कराती है, उस नाज़ुक़ पहलू को हमने कहीं कुचल दिया है। आज हर बात पर सवाल खड़े हो जाते हैं। हमारी आस्था आज हमारी अपनी नहीं, उसको समाज का validation चाहिए। लोग कहते हैं भगवान नहीं विज्ञान है। मैं पूछता हूँ दोनों अगर साथ हों तो क्या बुरा है। किसी को अगर किसी पत्थर या पेड़ के आगे आंसू बहाने से सुकून मिलता है तो  क्यों न उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाये। जब तक मेरी निष्ठा आपकी स्वतंत्रता पर आक्रमण नहीं कर रही, क्यों न मुझे ये आज़ादी रहे की मैं जैसे चाहूँ उसे मुखर कर सकूँ। मगर हमने निष्ठा को भी business बना दिया। और आज निष्ठा को धर्म का चोला पहना कर उससे राजनीती की खाद बनाई जा रही है , दंगे करवाए जा रहे हैं। गहरे सोचिये तो यहाँ धर्म या आस्था अपराधी नहीं हैं, अपराधी हम हैं , हमारा लालच है. मैंने बहुत पढ़े लिखे लोगों से बात की है। उनमें से एक सज्जन मुझे एक दिन बोले "मेरा बस चले तो मैं फलाना भगवान की मूर्ति के साथ ये कर दूँ, वो कर दूँ." मैं आज तक मन ही मन सोचता हूँ, ये वो लोग हैं जो  एक mythological concept पर अपनी भड़ास निकल रहे हैं। इनके जीवन में व्यवस्था के अन्याय के खिलाफ लड़ने का एक भी ऐसा उदाहरण नहीं जिसके बूते पर ये अपने आप को इतना बड़ा विद्रोही या "non-conformist " सोचते हैं। मेरी समझ से ये लोग intellectual नहीं मुंगेरीलाल या शेखचिल्ली जैसे हैं जो हमेशा अपनी बुद्धिमत्ता के नशे में हैं। इसमें भी एक violence, एक oppressive सोच दबी है। ये भी अपने अपने हवाई किलों के शहंशाह हैं और जब भी मौका मिलता है ये बहुत आवाज़ करते हैं।
खैर ऐसे कई सन्दर्भ उठाये जा सकते हैं मगर बात बहुत लम्बी हो जाएगी। आज ज़रूरत इस बात की है  कि हम सबको अपने आप को कटघरे में खड़ा करना होगा और खुद अपना न्याय करना होगा। हमें बहुत ध्यान से अपनी सोच और अपने कृत्य को परखना होगा कि  हिंसा और लालच के इस कोलाहल के बीच में हम क्या कर सकते हैं  जिससे हमारे संस्कारों में जो कुछ भी कोमल है, नाज़ुक़ है उसकी  हिफाज़त हो सके। कैसे हम अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ सोच , एक गहरी समझ की विरासत बचा सकें जिससे हमारा आने वाला कल हमें अपना अपराधी मानने की जगह हमारा धन्यवाद दे।

Tuesday, July 2, 2019

ये शर्त तो नहीं कि दिल की जुबां तक आये,
कम नहीं है जो तीर कमां तक आये

न जाने क्या गुज़री उनपर जो ,
उठ कर काबे से कू-ए -बुताँ तक आये

वक़्त के हाथों ही होगा ये फैसला अब,
हम कहाँ से गुज़रे और कहाँ तक आये

तेरा दुख मुझसे कहा है चाँदनी ने,
झिझकी सी जब  मेरे शबिस्ताँ तक आये

है आती ग़ज़ल में कैफ़ियत तब,
दर्द बढ़कर जो आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक आये 

Saturday, June 15, 2019

The Vanity of Vernacular Inheritance

In a country like ours with a vast and topographically varied geographical extent, it is not unnatural that different parts of it would be endowed with stark differences in their cultural elements comprising of food choices, social and religious customs and of course languages. These stark differences have played a big role in shaping the rich cultural history of the whole subcontinent and also dynamically played a role in aiding the assimilation and absorption of the foreign elements into our own way of life through the passage of time. 

Through this natural course of cultural evolution different regions have been able to identify themselves as strongly knit communities having their own cultural past while belonging to a larger social and political fabric of a nation state. We can as easily identify the differences between the languages spoken in the southern and northern regions as we can contrast the food preferences between the western and eastern states.

As much as these variations are like the different coloured threads of a giant beautiful tapestry, there is a very agonizing outcome of such varied vernacular affiliations that poses a threat to the smooth amalgamation of the elements of such a diverse dynamic. One's identification with his or her own vernacular heritage is no doubt a matter of pride and satisfaction. But problem comes when such a sentiment degenerates to the extent of vanity. Then it changes the whole picture of a peaceful coexistence of varied elements into a struggle for establishing the supremacy of one over the other. Such kind of a cultural tussle does not remain limited to the extent of being a mere cultural debate but gradually percolates into many functional aspects of our everyday lives. It leads us into thinking that the literature from a certain region or language is superior to others, or a certain profession or vocation is a natural home turf of people speaking a certain language. This is where we shift from being an assimilative and tolerant society into one where different regional or linguistic identities function in the manner of cartels. The selfish intent of pushing one's own religious, cultural or linguistic identity over that of others to promote their own agenda creates divisive tendencies which not only hampers a natural cultural flow across regions but also creates an unhealthy environment of fear, doubt and mistrust across communities.

To take an example, merely the fact that Tusli Ramayan is a work in Awadhi dialect does not make it an exclusive heritage of the Awadhi, Maithili speaking region of India. It belongs as much to a Malayali or a Tamilian as much as it does to a Bhojpuri speaking person. A couplet ("sher") from Meer would mean the same if it comes out of the mouth of a Hindu or a Muslim or a Jain or a Parsi. A heritage is a heritage for all who find a reason to associate themselves to it, derive pleasure and solace from it.

In the present tumultuous times where every issue can be coloured in a divisive manner for the selfish gains of a small group of people, we should take extreme care to not lose sight of reason. We would have failed our cultural lineage and inheritance if we start seeing our victory in the plight of others.      

  

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...