जो कहने जा रहा हूँ उसमें कुछ नया नहीं है। लेकिन मन को कोई बात यदि कचोटने लगे तो शायद कह देना अच्छा है। आजकल खबरों से बहुत डर लगने लगा है। अख़बार पढ़ना बहुत पहले छोड़ चुका हूँ। छितराये और हल्के-फुल्के मनोरंजन के लिए facebook और youtube का साथ है मगर वहाँ भी खबरें भूत की तरह पीछे लग गयी हैं। पर्यावरण की तबाही की खबरें, बलात्कार, हत्या जैसे कुकर्मों का विस्तार वर्णन, निकृष्ट स्तर की राजनीति जैसे तमाम सन्दर्भ आदि आदि।
एक समय था जब लोग एक दूसरे की निजी ज़िन्दगी में दिलचस्पी बनाये रखने के लिए social media से जुड़े रहते थे। 8 -9 साल पहले तक facebook / orkut (जो पुराने चावल हैं उनके लिए ) का मतलब था किसकी शादी किससे, किसकी नौकरी कहाँ , कौन कहाँ घूम रहा है वगैरह वगैरह। ये खालिस मनोरंजन था। देवरों को नयी भाभियाँ दिखतीं, रोमियो की जूलियट से बात होती। मगर अब वहाँ सिर्फ राजनीति है. सब लोग मदारी के खेल में जुटी भीड़ की तरह तमाशबीन हैं, मगर सब को लगता है उनका किरदार मुकम्मल है। मगर सोचने की बात ये है कि मदारी के खेल में सिर्फ बन्दर बन्दर नहीं होता। वो भीड़ को भी बन्दर की तरह बेवक़ूफ़ बनाता है। बन्दर के गले की रस्सी सबको दिखती है मगर रस्सी सबके गले में है। सब उछल रहे हैं और खेल बराबर जारी है.
खैर बात ख़बरों की हो रही थी। इन सब बुरी ख़बरों में एक बात जो मुझे बहुत साफ़ दिखती है वो ये है कि ये तमाम सन्दर्भ इस बात की ओर सीधा इशारा करते हैं की बीतते समय के साथ हम कहँ न कहीं अपने मनुष्य होने से जुड़ी कोमलता की सामूहिक हत्या कर चुके हैं। अपनी बौद्धिक यात्रा में मनुष्य ने सिर्फ तरक्की ही नहीं कमाई , बहुत बड़ा पतन भी कमाया। और यही पतन हमारी विरासत, हमारी थाती है. हम बाकी जीवों से चतुर थे या सच कहिए तो मक्कार थे, इसलिए प्रकृति पर अपना वर्चस्व कायम कर पाए। हमारे वर्चस्व ने हमें संसाधनों पर सत्ता दी, मगर हमारे लालच, हमारे अंदर की हिंसा से हम हार गए। पहुँचते पहुँचते हम आज वहां खड़े हैं जहाँ से हमें बहुत आगे नहीं दिख रहा। आज ज़मीन, हवा, पानी सबमें हम ज़हर घोल चुके हैं। और ये ज़हर हमारी आने वाली पीढ़ियों की नसों में,उनकी साँसों में जायेगा। सोच कर देखिए तो अजीब लगेगा-आदमी अकेला ऐसा जीव है जो हत्या को व्यवसाय में बदल सका। हमने death को भी एक commercial enterprise में बदल दिया। पहले हम भूखे थे इसलिए शिकार करते थे. जानवर आज भी भूख के मारे शिकार करता है। वो उसी नियम से आज तक बंधा है मगर हम अब व्यवस्थित हत्या का कारोबार बना चुके हैं। और यदि कोई सवाल पूछे तो ईमानदार जवाब सिर्फ ये होना चाहिए की हम ऐसा करते हैं क्यूंकि हम ऐसा कर सकते हैं. बुद्धिजीवी ऐसे सवाल में एक संकीर्ण मानसिकता देखते हैं। वो मानते हैं की इस तरह का सवाल "freedom of choice" के खिलाफ है। मगर मज़ेदार बात ये है की यहाँ "freedom" और "choice" ये दोनों शब्द हमने बड़ी चतुराई से सिर्फ अपनी बपौती मान लिए । आप जंगल में किसी भूखे शेर के सामने निशस्त्र खड़े होकर एक अंतिम बार इसी freedom of choice को बहुत अलग ढंग से समझ पाएंगे।
ये बात तो हुई हमारे और प्रकृति के रिश्तों की। मगर हमारे आपसी संबंधों की कोमलता , सहिष्णुता भी धीरे धीरे पथरा रही है। हम पढ़ लिख कर तार्किक बन गए, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना लिया लेकिन जो बात हमें हमारी ज़मीनी सच्चाई से जोड़ती है, एक दूसरे के दर्द और तकलीफ से सांझा कराती है, उस नाज़ुक़ पहलू को हमने कहीं कुचल दिया है। आज हर बात पर सवाल खड़े हो जाते हैं। हमारी आस्था आज हमारी अपनी नहीं, उसको समाज का validation चाहिए। लोग कहते हैं भगवान नहीं विज्ञान है। मैं पूछता हूँ दोनों अगर साथ हों तो क्या बुरा है। किसी को अगर किसी पत्थर या पेड़ के आगे आंसू बहाने से सुकून मिलता है तो क्यों न उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाये। जब तक मेरी निष्ठा आपकी स्वतंत्रता पर आक्रमण नहीं कर रही, क्यों न मुझे ये आज़ादी रहे की मैं जैसे चाहूँ उसे मुखर कर सकूँ। मगर हमने निष्ठा को भी business बना दिया। और आज निष्ठा को धर्म का चोला पहना कर उससे राजनीती की खाद बनाई जा रही है , दंगे करवाए जा रहे हैं। गहरे सोचिये तो यहाँ धर्म या आस्था अपराधी नहीं हैं, अपराधी हम हैं , हमारा लालच है. मैंने बहुत पढ़े लिखे लोगों से बात की है। उनमें से एक सज्जन मुझे एक दिन बोले "मेरा बस चले तो मैं फलाना भगवान की मूर्ति के साथ ये कर दूँ, वो कर दूँ." मैं आज तक मन ही मन सोचता हूँ, ये वो लोग हैं जो एक mythological concept पर अपनी भड़ास निकल रहे हैं। इनके जीवन में व्यवस्था के अन्याय के खिलाफ लड़ने का एक भी ऐसा उदाहरण नहीं जिसके बूते पर ये अपने आप को इतना बड़ा विद्रोही या "non-conformist " सोचते हैं। मेरी समझ से ये लोग intellectual नहीं मुंगेरीलाल या शेखचिल्ली जैसे हैं जो हमेशा अपनी बुद्धिमत्ता के नशे में हैं। इसमें भी एक violence, एक oppressive सोच दबी है। ये भी अपने अपने हवाई किलों के शहंशाह हैं और जब भी मौका मिलता है ये बहुत आवाज़ करते हैं।
खैर ऐसे कई सन्दर्भ उठाये जा सकते हैं मगर बात बहुत लम्बी हो जाएगी। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम सबको अपने आप को कटघरे में खड़ा करना होगा और खुद अपना न्याय करना होगा। हमें बहुत ध्यान से अपनी सोच और अपने कृत्य को परखना होगा कि हिंसा और लालच के इस कोलाहल के बीच में हम क्या कर सकते हैं जिससे हमारे संस्कारों में जो कुछ भी कोमल है, नाज़ुक़ है उसकी हिफाज़त हो सके। कैसे हम अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ सोच , एक गहरी समझ की विरासत बचा सकें जिससे हमारा आने वाला कल हमें अपना अपराधी मानने की जगह हमारा धन्यवाद दे।