ये शर्त तो नहीं कि दिल की जुबां तक आये,
कम नहीं है जो तीर कमां तक आये
न जाने क्या गुज़री उनपर जो ,
उठ कर काबे से कू-ए -बुताँ तक आये
वक़्त के हाथों ही होगा ये फैसला अब,
हम कहाँ से गुज़रे और कहाँ तक आये
तेरा दुख मुझसे कहा है चाँदनी ने,
झिझकी सी जब मेरे शबिस्ताँ तक आये
है आती ग़ज़ल में कैफ़ियत तब,
दर्द बढ़कर जो आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक आये
कम नहीं है जो तीर कमां तक आये
न जाने क्या गुज़री उनपर जो ,
उठ कर काबे से कू-ए -बुताँ तक आये
वक़्त के हाथों ही होगा ये फैसला अब,
हम कहाँ से गुज़रे और कहाँ तक आये
तेरा दुख मुझसे कहा है चाँदनी ने,
झिझकी सी जब मेरे शबिस्ताँ तक आये
है आती ग़ज़ल में कैफ़ियत तब,
दर्द बढ़कर जो आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक आये
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