Sunday, November 24, 2013

जैसे

ये चाँद कई रातों में जागा है तनहा ऐसे ,
किसी मज़ार पे रखा हो कोई दिया जैसे

मिलती है ज़िन्दगी हर मोड़ पे अब यूँ  ,
किसी फ़कीर के हिस्से की दुआ हो जैसे

 है वो आशना मुझसे कुछ  इस तरह ,
जाने है सब और कुछ भी न पता हो जैसे

गुज़रे हैं दिल पे हसरतों के मुक़ाम ऐसे ,
 दर -ऐ -क़फ़स से गुज़रती सबा हो जैसे



Note :
आशना = acquainted
क़फ़स = prison
सबा = breeze







 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...