Friday, May 21, 2010

याद ....

ना मंजिल थी , ना कारवाँ रहा ,
कुछ गुबार था , कुछ धुआँ रहा ...

गुज़री तन्हा यूँ तो राह -ऐ -ज़िन्दगी ,
तुम साथ थे मगर , मैं जहाँ रहा .....

टुकड़ों टुकड़ों में ख़ुशी , आई हयात लेकर ,
तेरी रहमत का मुझे , कुछ यूँ गुमाँ रहा ....

और की मुझे , आरज़ू भी क्या ,
रकीब ही यहाँ , जो राज़दां रहा ....

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...