कुछ गुबार था , कुछ धुआँ रहा ...
गुज़री तन्हा यूँ तो राह -ऐ -ज़िन्दगी ,
तुम साथ थे मगर , मैं जहाँ रहा .....
टुकड़ों टुकड़ों में ख़ुशी , आई हयात लेकर ,
तेरी रहमत का मुझे , कुछ यूँ गुमाँ रहा ....
और की मुझे , आरज़ू भी क्या ,
रकीब ही यहाँ , जो राज़दां रहा ....
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