Friday, November 1, 2019

new poem

हमने माना कि वो बहुत दाना है,
दिल-ए -मजबूर का मगर अपना ही फ़साना है .... 

बदल लेगा वो शहर भर के रास्ते लेकिन ,
अपने घर उसने इसी गली से जाना है ....

हर गाम पर रोके हैं ये चाँद ये तारे ये जुगनू ,
दिन के मुसाफिर ने मगर सहर तक जाना है ....

इश्क़ की हमसे अब और न कहिये ज़ाहिद,
बीमार बदल जाते हैं, पर मर्ज़ पुराना है ....



दाना = wise
गाम  = step

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