Wednesday, February 17, 2010

मधुशाला

भग्न हृदय कि करुणा से ,
आज रचा मैंने प्याला ...

अमर क्षुधा इन प्राणों की ,
माँग रही कैसी हाला ...

भूल चूका था मैं तो लेकिन ,
याद रहा फिर भी उसको ...

बुला रहा है प्रियतम साकी ,
खुली है फिर से मधुशाला ....

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