आज रचा मैंने प्याला ...
अमर क्षुधा इन प्राणों की ,
माँग रही कैसी हाला ...
भूल चूका था मैं तो लेकिन ,
याद रहा फिर भी उसको ...
बुला रहा है प्रियतम साकी ,
खुली है फिर से मधुशाला ....
मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ ..... उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...
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