यूँ अब अहल -ए -जहाँ से मिला करते हैं ,
खुद से तो कभी ज़िन्दगी से गिला करते हैं
सुबह की धूप , शब की चांदनी सी,
हर दुआ हो जाये ये दुआ करते हैं
ये शरीफों की बस्ती है यहाँ कौन पूछे
मुफ़लिसी के जंगल यूँ ही जला करते हैं
ये घर की दीवारें, ये कमरे का आइना
कुछ मुझसे कहा करते हैं, कुछ मुझसे सुना करते हैं
है यादों का एक दरख़्त दिल के आँगन में
जब भी हवा चलती है , कुछ फूल गिरा करते हैं
खुद से तो कभी ज़िन्दगी से गिला करते हैं
सुबह की धूप , शब की चांदनी सी,
हर दुआ हो जाये ये दुआ करते हैं
ये शरीफों की बस्ती है यहाँ कौन पूछे
मुफ़लिसी के जंगल यूँ ही जला करते हैं
ये घर की दीवारें, ये कमरे का आइना
कुछ मुझसे कहा करते हैं, कुछ मुझसे सुना करते हैं
है यादों का एक दरख़्त दिल के आँगन में
जब भी हवा चलती है , कुछ फूल गिरा करते हैं
Progress Achchi hai :-)
ReplyDeletethanks Sir ji :)
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