Tuesday, January 13, 2015

यूँ  अब अहल -ए -जहाँ  से मिला करते हैं ,
खुद से  तो कभी ज़िन्दगी से गिला करते हैं

सुबह की धूप , शब की चांदनी सी,
हर दुआ हो जाये ये दुआ करते हैं

ये शरीफों की बस्ती है यहाँ कौन पूछे
मुफ़लिसी के जंगल यूँ ही जला करते हैं

ये घर की दीवारें, ये कमरे का आइना
कुछ मुझसे कहा करते हैं, कुछ मुझसे सुना करते हैं

है यादों का एक दरख़्त  दिल के आँगन में
जब भी हवा  चलती है , कुछ फूल गिरा करते हैं







2 comments:

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...