थे वो पास और कुछ दूरी सी ,
चाँद पूरा और रात अधूरी सी ....
खेल रही थी शाम पलकों पर ,
रात की चादर हलकी सी कुछ गहरी सी ...
खामोश नज़र से कैसे कैसे अफ़साने ,
बात रह गयी पर होते होते पूरी सी ...
नफस नफस बस एक सा आलम ,
जाते जाते रह जाये कोई हसरत ठहरी सी ....
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