Wednesday, September 23, 2020

यूँ तो भीड़ में बाज़ारों के, दुकानों के हैं ,
हम अकेले में किताबों के ,मैखानों के हैं 

ये खुशबु, ये तारे, ये बारिश, ये जुगनू ,
सब किरदार ये अपने फ़सानों के हैं 

गुज़र जाते हो तुम जिनसे किनारा करके,
खून के ये धब्बे किसानों के हैं 

खामोश रातों में जो सोने नहीं देते ,
अज़ल से शोर दिल के वीरानों के हैं 

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