लोग मुकद्दर पे यकीन नहीं करते। मैं करता हूँ और अक्सर मेरे दोस्त मेरे नाकारापन पर हँसते हैं। पर आज जो हुआ वो बात कहूँ तो छोटी है मगर मुझे सुकून दे गयी।
मैं जहाँ रहता हूँ उससे थोड़ी दूर पैदल ही सेवालाल जी की चाय की दूकान है. वो कभी कभी समोसे भी उतारते हैं और मुझे उनकी चाय और समोसों की लत सी है। मगर समोसे हमेशा नहीं बचते। खपत ज्यादा है। आज भी शाम को जब दुकान गया तो पूछा ," अंकल जी समोसे हैं ?", बोले " दस मिनट देर कर दी आपने। " उनके बोलने तक मेरे मुंह से निकला " हाँ देर तो कर दी। हमेशा ही मुझे देर हो जाती है। जहाँ पहुंचा हूँ देर से ही पहुंचा हूँ। " इतने में एक आदमी दौड़ता हुआ आया और कहा " चचा हमारा पैकेट दे दो। " सेवालाल जी बोले "कबहीं से बाँध के रखे हैं। अब पूछत हो कि पैकेट दे दो। " तब तक समोसे ख़तम थे और मठरियां उतर रहीं थीं। उसको जाने क्या सूझी कि बोला ," जो ताजा है वो दो। " वो जैसे जल्दी में आया था वैसे ही मठरियां बंधवा कर निकल लिया। उसका पैकेट बंद वहीँ पड़ा था।
सेवालाल जी मेरी ओर देखे , पैकेट खोला और बोले, "तीन लेंगे कि दो ?" मेरी हंसी छूट गयी। "मुकद्दर खराब नहीं है मतलब। समोसे मिल गए। "
तभी मुझे दिल्ली के एक टीचर की बात याद आ गयी। उन्होंने एक दिन हमसे कहा था " जो आपका है वो आपको मिलेगा ही। और जो आपका नहीं है वो आपको कभी नहीं मिल सकता चाहे आप कुछ कर लें। जो आप कर सकते हैं वो इतना है कि हर दिन अपने आप को कुछ और बेहतर बनाने की कोशिश करें। इतना बहुत होगा आपके लिए ।"
मैं बहुत दिन बाद ऐसे हंसा हूँ। शायद वाकई में मेरे हिस्से के समोसे कहीं नहीं गए।
वो बंद पड़े हैं और जब मिलेंगे तो गरम ही मिलेंगे।
मैं जहाँ रहता हूँ उससे थोड़ी दूर पैदल ही सेवालाल जी की चाय की दूकान है. वो कभी कभी समोसे भी उतारते हैं और मुझे उनकी चाय और समोसों की लत सी है। मगर समोसे हमेशा नहीं बचते। खपत ज्यादा है। आज भी शाम को जब दुकान गया तो पूछा ," अंकल जी समोसे हैं ?", बोले " दस मिनट देर कर दी आपने। " उनके बोलने तक मेरे मुंह से निकला " हाँ देर तो कर दी। हमेशा ही मुझे देर हो जाती है। जहाँ पहुंचा हूँ देर से ही पहुंचा हूँ। " इतने में एक आदमी दौड़ता हुआ आया और कहा " चचा हमारा पैकेट दे दो। " सेवालाल जी बोले "कबहीं से बाँध के रखे हैं। अब पूछत हो कि पैकेट दे दो। " तब तक समोसे ख़तम थे और मठरियां उतर रहीं थीं। उसको जाने क्या सूझी कि बोला ," जो ताजा है वो दो। " वो जैसे जल्दी में आया था वैसे ही मठरियां बंधवा कर निकल लिया। उसका पैकेट बंद वहीँ पड़ा था।
सेवालाल जी मेरी ओर देखे , पैकेट खोला और बोले, "तीन लेंगे कि दो ?" मेरी हंसी छूट गयी। "मुकद्दर खराब नहीं है मतलब। समोसे मिल गए। "
तभी मुझे दिल्ली के एक टीचर की बात याद आ गयी। उन्होंने एक दिन हमसे कहा था " जो आपका है वो आपको मिलेगा ही। और जो आपका नहीं है वो आपको कभी नहीं मिल सकता चाहे आप कुछ कर लें। जो आप कर सकते हैं वो इतना है कि हर दिन अपने आप को कुछ और बेहतर बनाने की कोशिश करें। इतना बहुत होगा आपके लिए ।"
मैं बहुत दिन बाद ऐसे हंसा हूँ। शायद वाकई में मेरे हिस्से के समोसे कहीं नहीं गए।
वो बंद पड़े हैं और जब मिलेंगे तो गरम ही मिलेंगे।
bahut badhiya sir ji..very positive and refreshing . समोसे कहीं नहीं गए। जब मिलेंगे तो गरम ही मिलेंगे। :) :)
ReplyDeletethanks ... garam milne hi chahiye .. :)
ReplyDeleteYou've a lovely innocence in the way you write. Let not the stupid wild west or peer pressure destroy it. The piece really instantly and in a silly way uplifted my feelings.
ReplyDeleteThank you, Siddharth
thanks Devika ... :)
ReplyDeleteउम्मीद है, कि जब वापस आउंगा तो गरम ही मिलेंगे समोसे मेरे हिस्से के भी। :-)
ReplyDeleteGuru Ji ki jai ho !! :)
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