सहमे सहमे से सन्नाटे
दबी कुचली हसरतों का हाथ थामे
मेरे घर के वीराने में
एक शोर सा बरपाते हैं
कुछ आवाज़ें घुटी घुटी
कुछ चीखें नाराज़ सी
मगर सब कुछ ठहरा ठहरा सा
वक़्त के दामन से
किसी घाव से लहू की मानिंद
क़तरा क़तरा रिस रहा है
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