मेरी चाहतों की फेहरिस्त में ,
ये कितने मकाम जुड़ गए दिल के छोटे से इस घर में ,
कितने सामान जुड़ गए
मगर अब भी एक कोना है ,
खाली सा , उदास सा
अनसुनी बातों का ,
अनकही प्यास का
हो सके तो इसे
यूँ ही रहने देना
कि इसके खालीपन में
कि इसके खालीपन में
मेरे होने के कुछ निशाँ
अब भी बाकी हैं
और मैं खुद से , सब से ,
दूर होकर भी
कुछ कुछ इसका हूँ
और ये मेरा है
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