Sunday, November 24, 2013

जैसे

ये चाँद कई रातों में जागा है तनहा ऐसे ,
किसी मज़ार पे रखा हो कोई दिया जैसे

मिलती है ज़िन्दगी हर मोड़ पे अब यूँ  ,
किसी फ़कीर के हिस्से की दुआ हो जैसे

 है वो आशना मुझसे कुछ  इस तरह ,
जाने है सब और कुछ भी न पता हो जैसे

गुज़रे हैं दिल पे हसरतों के मुक़ाम ऐसे ,
 दर -ऐ -क़फ़स से गुज़रती सबा हो जैसे



Note :
आशना = acquainted
क़फ़स = prison
सबा = breeze







3 comments:

  1. जो गर्दिश-ए-जश्न मनाने का शौक रखते हैं, उन्हीं की जिन्दगी नजीर हुआ करती है।
    सुहाने फूल तो कोई भी सूंघ लेता है , काबिल-ए-गौर हैं, कांटों को तोड़ने वाले ॥

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