Thursday, October 17, 2013

दुआ

इलाही मेरे जुनून को कभी आराम तो दे ,
राहत ना सही, इन बेचैनियों को कोई नाम तो दे  ...

मुद्दत हुई कि आरज़ू भटकती रही इस दयार में ,
आगाज़ ना सही, इस सफ़र को कोई अंजाम तो दे ...

ज़िन्दा लाशों की भीड़ है हर सिम्त यहाँ  ,
इस शहर के नसीब में कोई कोहराम तो दे ...

नन्ही कलियों की खुशबू जहाँ महफूज़ रह सके ,
मेरे चमन को ऐसी सुबह -ओ -शाम तो दे ..

मेरे हौसलों की बुलंदी तू परख ले मगर ,
हसरत-ए - गुनाह को मेरी उम्र-ए -दवाम तो दे ...


Note :
उम्र-ए -दवाम = eternal life
..




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 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...