Wednesday, April 29, 2020

निभा रहे हैं

ज़िन्दगी से इश्क़ बड़े जतन से निभा रहे हैं ,
वो हर ढंग रूठती, हम हर तौर मना रहे हैं

भीगी पलकों पे उसने होंठ याद आए ,
हम अबस अपने ग़मों पे मुस्कुरा रहे हैं

तुम्हारे शहर में कोई भी तो ग़मगुसार नहीं,
आशना हैं, तो आ रहे हैं जा रहे हैं

वो एक शख़्स मानिंद-ए -आइना मुझको,
मुक़ाबिल जिसके कि हम घबरा रहे हैं

यूँ नहीं कि वो हमें सोचता न हो ,
ये और है कि आप कुछ छुपा रहे हैं




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अबस = व्यर्थ
ग़मगुसार = हमदर्द
आशना  = जान पहचान वाला 

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