Monday, March 16, 2020

लगता है ..

मुलाक़ातों का रंग कुछ नया सा लगता है ,
वो अजनबी भी अब आशना सा लगता है ..

परकटे पंछी सी तड़पती है परवाज़-ए -तमन्ना ,
कैसे कह दूँ कि हक़ में लिखा सा लगता है  ...

शहर में ज़िक्र उठा है किसी रंज-ओ-मलाल का ,
ये किस्सा भी कुछ कुछ सुना सा लगता है ...

इस जलती बस्ती में घर तेरा भी है मेरा भी ,
हो न हो, ये अपनों का किया सा लगता है  ...  

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