मुलाक़ातों का रंग कुछ नया सा लगता है ,
वो अजनबी भी अब आशना सा लगता है ..
परकटे पंछी सी तड़पती है परवाज़-ए -तमन्ना ,
कैसे कह दूँ कि हक़ में लिखा सा लगता है ...
शहर में ज़िक्र उठा है किसी रंज-ओ-मलाल का ,
ये किस्सा भी कुछ कुछ सुना सा लगता है ...
इस जलती बस्ती में घर तेरा भी है मेरा भी ,
हो न हो, ये अपनों का किया सा लगता है ...
वो अजनबी भी अब आशना सा लगता है ..
परकटे पंछी सी तड़पती है परवाज़-ए -तमन्ना ,
कैसे कह दूँ कि हक़ में लिखा सा लगता है ...
शहर में ज़िक्र उठा है किसी रंज-ओ-मलाल का ,
ये किस्सा भी कुछ कुछ सुना सा लगता है ...
इस जलती बस्ती में घर तेरा भी है मेरा भी ,
हो न हो, ये अपनों का किया सा लगता है ...
No comments:
Post a Comment