जो आये ना ख़याल तेरा तो डर जाते हैं
सामने कुछ कहने से बस मुकर जाते हैं
वो और होंगे जिन्हे आईने की ज़रूरत है,
हम हैं कि उसे सोच लें तो संवर जाते हैं
ज़िन्दगी की आदत है कि इम्तेहान लेती है,
ज़ख्मों की आदत है कि भर जाते हैं
खबर कहाँ परिंदों को पेड़ों की छाँव में ,
नसीब में किसके कि कितने सफर आते हैं
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