कैसे बताएं खुद से कैसे घबराये हैं हम ,
कू-ऐ-यार तक पहुंचे कि लौट आये हैं हम ....
मेरी चुप को वो समझे है बेरुखी या रब ,
दिल की भला होंठों पे कब लाये हैं हम ...
क्यूँकर न गुज़रेगी ये शाम-ऐ-बेकसी ,
दिल -ऐ -ज़ार पे जो नश्तर से उतर आये हैं हम ...
गिरफ्त -ए-जुनूँ में कुछ यूँ भी गुज़री है हम पे ,
खुद ही से अजनबी से पेश आये हैं हम ...
गुमनाम शक्लों की भीड़ में हारती तलाश है ,
फिर हुआ कि थके थके से घर आये हैं हम ...
chacha ..welcome hai
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