Thursday, November 12, 2009

हयात

कैसे बताएं खुद से कैसे घबराये हैं हम ,
कू-ऐ-यार तक पहुंचे कि लौट आये हैं हम ....


मेरी चुप को वो समझे है बेरुखी या रब ,
दिल की भला होंठों पे कब लाये हैं हम ...


क्यूँकर न गुज़रेगी ये शाम-ऐ-बेकसी ,
दिल -ऐ -ज़ार पे जो नश्तर से उतर आये हैं हम ...


गिरफ्त -ए-जुनूँ में कुछ यूँ भी गुज़री है हम पे ,
खुद ही से अजनबी से पेश आये हैं हम ...


गुमनाम शक्लों
की भीड़ में हारती तलाश है ,
फिर हुआ कि थके थके से घर आये हैं हम ...

1 comment:

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...