Sunday, November 15, 2009

एक बूँद ओस

एक बूँद ओस ,
और दो पलकें नम

महकी सी ये खुशियाँ ,
चुभते से ये गम

कहीं जेठ का तपता सूरज ,
कहीं बूंदों में गाता सावन

घर अपनों का प्यार सहेजे ,
तुलसी का वो पावन आँगन

कहीं बुलाती क्षुधा सुंदरी ,
कहीं तृप्ति का मौन आलिंगन

कभी सुरों के मेले सजते ,
कभी मौन का नीरव गुंजन

इसी अर्थ में सिमटा फैला ,
पल पल बीता मेरा जीवन
पल पल बीता मेरा जीवन

1 comment:

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...