Thursday, July 16, 2020

यही गुफ़्तगू रहती है कभी धूप से कभी छाँव से,
दूर बहुत आ गए हैं हम अपने गाँव से ,

तेरी यादों के साथ भी ये सफर कटता नहीं
न थकन ही जाती है न छाले पाँव से 

2 comments:

  1. "तेरी यादों के साथ भी ये सफर कटता नहीं
    न थकन ही जाती है न छाले पाँव से "

    बहुत गहराई है सर जी❤️

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