Thursday, January 16, 2014

आप मैं और हम सब

बीते कुछ सालों में लगता है दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है। सुनता हूँ कि लोग जाग गए हैं। सोच बदल गयी है और दबी हुई आवाज़ें विद्रोह और आक्रोश की चीखों में तब्दील हो रही हैं। अब भीड़ के पास ताकत है और वही नयी दुनिया का आगाज़ बनेगी।
मगर जब इस शोर शराबे से दूर हटकर जब मैं अकेले इंसान की ज़िन्दगी के लिये इन सब बातों का मतलब तोलने लगता हूँ तो बहुत कुछ अधूरा और बेमानी सा लगता है। अकेले आदमी की पीड़ा भीड़ का संघर्ष बन गयी और हमको जीने का मतलब मिल गया। मगर मैं यह सोचने पर मजबूर हूँ कि जितने आंसू गिरे , क्या यह सब चीख चिल्लाहट उनके लिए वाकई में न्याय में बदलेगी ? क्यूंकि अपनी मोटी बुद्धि में मैंने दुःख को बहुत ज़ाती जाना और समझा है। हमारे संघर्ष जो वयवस्था , कानून या सियासत के खिलाफ हैं और जिनमें हमने हर तबके कि आवाज़ को शामिल करने कि कोशिश की है या कर रहे हैं , वो हमें लड़ने की वजह दे सकते हैं और हमारे सरोकारों को और व्यापक बना सकते हैं मगर क्या वो सच में हमारे आंसू पोंछ सकते हैं ?
मैं इंसान के जागने के खिलाफ नहीं हूँ मगर इस बात को डरता हूँ कि कहीं ये उफान और शोर हमें उन छोटी छोटी बातों से दूर तो नहीं कर रहा जिनसे शायद वाकई में हमारा होना कोई मतलब रखता है ? कहीं सिद्धांतों के लिए लड़ते लड़ते हम ज़िन्दगी की रोज़ की धूप छाँव की अनदेखी तो नहीं करते जा रहे ?
मेरे अपने जीवन में ऐसे उदाहरण कई बार मिले जिन्होंने मुझे जीवन के इस कोमल पक्ष की ओर देखने का मौका दिया। मैंने बीते कुछ साल दिल्ली में बिताये हैं। वहाँ connought place में कई बार आना जाना होता था दोस्तों के साथ तफरी करने के लिए। उस बाज़ार कि भीड़ में अक्सर मुझे एक औरत दिखायी पड़ती जिसकी handicrafts की दुकान थी और विदेशी और हमारे लोग अक्सर ज़मीन पर बिछाये उसके सामान को देखने खरीदने को जमा रहते। मगर जिस बात ने मेरा ध्यान खींचा वो यह थी कि उसके आस पास हमेशा  6 ,7 कुत्तों की भीड़ रहती थी। उसने उनके खाने का , पानी पीने के बर्तन , सबका इंतज़ाम कर रखा था। यही नहीं जाड़ों के दिनों में भी वह उन कुत्तों के बदन कपड़ों से  ढके रखती थी। उसे देख कर मुझे बहुत सुकून महसूस होता और मन यह सोच कर हल्का हो जाता कि शायद ज़िन्दगी हर बार बड़ी बातों के लिए परेशान होने का सबब नहीं है। और मैं यह सोच कर खुश हो जाता कि कुछ बड़ा नहीं तो ऐसा ही कुछ छोटा करके मैं जीने की कोशिश कर सकता हूँ।
यह कहने के पीछे मेरा तर्क सिर्फ इतना है कि उसूलों और सोच के झगड़ों से अलग यदि अपने जीवन में हम अपने आस पास की छोटी छोटी बातों के लिए जीने की कोशिश करें तो शायद बहुत कुछ तब भी बदला जा सकता है। यदि किसी भूखे जानवर को 2 कौर खिला सकें , किसी सूखते पेड़ को पानी दे सकें ,किसी एक के भी आंसू यदि हमारी आँखों में उतर आयें तो मेरी समझ में ऐसी ज़िन्दगी किसी क्रांति से छोटी नहीं।
हमारा जीवन  हमारे निर्णयों का विस्तार है। यदि हम अपने निर्णय और न्याय को एक कर सके तो शायद ये हमारी बहुत बड़ी जीत होगी। तय यह करना है कि उस न्याय की शक़्ल क्या हो।

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