Thursday, January 31, 2013

मुन्तज़िर

मुन्तज़िर हूँ  कि कभी दर्द -ए -इश्क़ आज़माए मुझको भी ,
यूँ  भूला हूँ कि कोई तो याद आये मुझको भी

रह गयी हैं  क़ैद कागजों में  निशात -ओ -ग़म  की बातें ,
फ़साना-ए -हस्ती दुनिया  कभी सुनाये मुझको भी

दर खुदा का दूर महबूब का भी ,
कोई तो राह दिखाए मुझको भी

हो गया हूँ खुद ही से गैर किस क़दर ,
मिलते हैं यूँ तो अपने पराये मुझको भी

जल्वानशीं रहा वो किस अदा से चारसू
 क्या क्या ना जलवे दिखाए मुझको भी


note : 1) मुन्तज़िर = in waiting
         2) निशात -ओ -ग़म  = happiness and sorrow
          3) चारसू = in all directions




3 comments:

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...