Saturday, April 27, 2013

कभी

यूँ तो न था कि वो न थे हमारे कभी,
यूँ  रहा कि जीते कभी और हम हारे कभी...

अब ये गर्द -ए -सफ़र हुई  नसीब अपना ,
साथ थे जहाँ फूल खुशबू  चाँद तारे कभी....

नींद आ भी जाए किसी रात हमको ,
ख़्वाब इन पलकों से कोई उतारे कभी ....

देहलीज़ पर हमने एक चिराग रख दिया,
भेजे हवाओं ने जब भी इशारे कभी ....


No comments:

Post a Comment

 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...