Monday, December 24, 2012

तल्ख़

रहे हम पास भी तो फासले दरमियाँ रहे  ,
ज़मीन से दूर दूर जैसे कि आसमाँ रहे .....

हर रात जागा  है ये सोच के आँगन मेरा .....
कभी चांदनी भी  घर  मेरे  मेहमान  रहे ..

ये  नहीं  कि उसे माँगा नहीं है रात दिन ...
पर मिले जब तो  मुझ सा ही कुछ परेशान रहे

रहें तेरी यादों के साये साथ अगर तो यूँ ...
कहीं दयार-ए -गम , कहीं दर्द का कारवाँ रहे


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 मिल्कियत सारी ये तेरी नज़र करता हूँ , तेरे शहर से कहीं दूर अब मैं घर करता हूँ .....   उजालों के साथी कुछ दूर तलक आये , किसे मालूम अंधेरों मे...