आप कहेंगे हर बार बात घूम फिर कर एक ही point के आस पास चक्कर काटती है , वो है life में लड़की . पर जहाँ खड़ा होकर मैं देख रहा हूँ वहां से बुरे भले ज़िन्दगी के सभी रास्ते इसी एक बिंदु की ओर दौड़ते हैं , कहे दुनिया चाहे जो भी . जो पा गए , वो छा गए . जो रह गए , वो बह गए .
मगर मैं आज बात लड़की, या सुन्दर लड़की से थोड़े ऊपर के level की करना चाहूँगा, वो है life, या शुद्ध हिंदी में कहें तो जीवन में सौन्दर्यबोध का होना या ना होना . यहाँ यदि कविता या ग़ज़ल या शायरों की नज़र से बात तोली जाये तो लगता है दुनिया में सूखे पत्ते से लेकर, उड़ती धूल और पेड़ पौधों से होते हुए माशूका के दुपट्टे की डिज़ाइन तक सब कुछ कहर ढाने वाला है . इससे थोड़ा आगे जायें तो माशूका के बदन की तराश, पलकों का उठना झुकना, जुल्फों का अँधेरा ( जिसमें बिजली विभाग का कोई हाथ नहीं ), etc etc , किसी गोश्त की दुकान की तरह अलग अलग परोस कर रखा जाए तो मानो क़यामत सिमट कर दो हाथ पाँव लेकर चलने फिरने लगी हो .
और जितना मैंने जाना है , इस मायाजाल को खड़ा करने में उर्दू बहुत बड़ी गुनहगार है . शब्दों की संरचना और वाक्य ऐसे बंधते हैं कि हाड़ मांस का बदन मानो खुदा को भी जलन से acidity का मरीज़ बना दे . अब अहमद फ़राज़ कि ये lines लीजिये .
सुना है उसके शबिस्तान से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
[शबिस्तान =bedroom; मुत्तसिल =near; मकीं =tenant, बहिश्त = heaven]
किसे नसीब के बे -पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर -ओ -दीवार घर के देखते हैं
[बे -पैरहन =without clothes]
इसको अगर ठेठ हिंदी में translate करूँ तो फ़राज़ कह रहे हैं कि , 'वो ' इतनी सुन्दर है कि उसके bedroom की खिड़की से उसकी सुन्दरता को आसमानी फ़रिश्ते भी ललचा के देखते हैं . अगली दो lines में वो कहते हैं कि भला किसे नसीब है कि 'उसे ' बिना कपड़ों के देखे , वो तो बस उसके घर के दरवाज़े और दीवारों के नसीब में ही है, वो भी कभी कभी .
भाई हद ही हो गयी so called अश्लीलता की . मगर साहब यही तो talent है शायरी का, शायर का और उर्दू का. जो चीज़ बोलचाल की भाषा में असभ्यता दिखती है , वही बात शायरी में 'aesthetic' या 'artistic' value ले लेती है . हमारे conoisseurs कहते हैं ना , नंगापन तो pornography में होता है , art में बस 'nudity' होती है .
लेकिन दिक्कत इन सब बातों की नहीं है , दिक्कत है कि इन सब ऊँची ऊँची बातों को पढ़कर मेरे जैसे छोटे दिमाग में जो खलल पैदा होता है , उससे निजात पाना लगभग नामुमकिन सा दिखता है . अब यदि अहमद फ़राज़ वाली लड़की किसी middle class household की शोभा है , तो लानत है हमारी ज़िन्दगी पर यदि उससे कुछ कम पाया तो . अब ढूंढते फिरो . और फिर रहे हैं झुम्मन मियाँ जैसे .
माफ़ करियेगा , झुम्मन मियाँ को इतना लेट introduce करने के लिए . झुम्मन मियां मेरे बहुत करीब के हैं , और गज़ब की शायराना फितरत के आदमी हैं . पढ़ाई लिखाई की उम्र से ही मानो माथे पर बर्बादी लिखवा ली खुदा से . दिमाग की जगह मुक़द्दर दिल पर हथौड़े चलाने लगी . यहाँ चोट खाई , वहां चोट खायी , इधर दिल टुटा , उधर सर फूटा, मगर झुम्मन मियाँ ना हारे . दिल-ए-नाकाम ने शायर बना डाला . अब हालत ये हुई कि अपनी ही एक हाथ , एक पाँव वाली शायरी में जिस महबूबा का तसव्वुर लिए अपने दिन रात सान डाले , उसको झुम्मन मियाँ अपनी हकीकत से अलग ना कर पाए . मगर खुदा की कुदरत देखिये , वही जानता है कि किसे कब , कैसे रुलाना है , मिटाना है , सताना है . झुम्मन मियाँ ने पड़ोसियों के दूर दूर के रिश्ते की बहन बेटियों से लेकर , ऑनलाइन , ऑफलाइन , ये dotcom वो dotcom सब कुछ छान मारा , किसी भूखे गिद्ध की नज़र से . मगर हुजूर को 'उनकी ' वाली ना मिली . कहीं height कम , तो कहीं weight ज़्यादा . कहीं हिंदी ख़राब तो कहीं आवाज़ कहर . झुम्मन मियाँ की हालत अब यूँ है कि हमसे मिलते हैं तो यूँ , मानो ज़िन्दगी एक भद्दा मज़ाक कर गयी उनके साथ . जैसे मानो सगी साली आपको भैया बुला दे . झुम्मन मियाँ का दर्द देखा नहीं जाता . मगर जी रहे हैं तो बस जी रहे हैं .
मगर खुदा का शुक्र है कि झुम्मन मियाँ की खस्ता हालत और तन्ग्नसीबी हमारे लिए बड़ा सबक बनी . बहुत मन मार कर आखिर में दिल को समझाया कि देखो गुरु ये हरे भरे खुशबूदार सपनों के garden को दिमाग में इतने जतन से पालने की कोई ज़रूरत नहीं है , इसको लगाओ आग और आँख खोल के दुनिया देखो . अब यदि ये खुशबूदार और बहकाने वाले मंज़र दिल -ओ -दिमाग को भिगोते भी हैं तो हम भीगे कुत्ते की तरह खुद ही अपने दिल - दिमाग को सुखा लेते हैं और फिर से 'life is good if not great' का मंतर याद कर के खुश रहने की कोशिश करते हैं .
तो अब होता यूँ है कि सड़क पर , दुकानों में , रेलवे प्लेटफार्म पर , बस अड्डे पर , इधर उधार जहाँ कहीं भी तलाश कूद फांद करती है , मैं देखता हूँ तो शायर कि महबूबा अक्सर दिखाई नहीं देती . दिखती हैं तो रूखी मुरझाई , थकी सी सूरतें , मानो जैसे राख के पुतलों में किसी ने जान फूँक कर जीने की सज़ा दे दी हो . भीड़ भाड़ में भीख मांगती , अपने बच्चों को पीटती , गाली देती , construction sites पे मजदूरी करती औरतों को ध्यान से देखने की कोशिश करता हूँ , तो सवाल उठता है कि क्या ये सब खूबसूरती और नजाकत के हिस्से से अपने लिए कुछ चुरा के ना ला सकीं ? जिस हुस्न कि दौलत से सजकर शायर कि माशूका का बिस्तर उसके आशिक को तरसाता है, क्या उसका एक भी हिस्सा हमारी दुनिया के गुम अँधेरे कोनों में अपने 'आदमियों ' ki 'भूख' से हारी लुटी औरतों की ज़िन्दगी में उतरता होगा ? इन रूखे बालों , फटे तलवों , अधनंगे बदन और बदहाल ज़िन्दगी को ढोती औरतों में क्या किसी के शौक़ को जगाने का हुनर कभी आ सकेगा ? या हुस्न और इश्क सिर्फ middle class या upper middle class या affluent class के हिस्से ही आया , जहाँ आप intelligent and beautiful दोनों हो सकते हैं . Dove साबुन से नहा सकते हैं , 'freedom of man' पर भाषण दे सकते हैं , classical music सुन सकते हैं , और लच्छेदार शब्दों में बात कर सकते हैं .
कभी कभी लगता है कि शायर चालाक निकला .
मैं नहीं कहता कि दुनिया में हुस्न की रंगत नहीं है . वरना झुम्मन मियाँ और मुझ जैसे नाकाम आशिक कहाँ से होते . मैं ये भी नहीं कहता कि खुदा का इन्साफ झूठा है . मगर क्या है कि झुम्मन मियाँ अकेले हैं , सोचते हैं , और मैं , मैं आज भी , बस देख रहा हूँ .
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